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1971 की जंग पर बन रही है 'पिप्पा', ईशान खट्टर होंगे ब्रिगेडियर बलराम सिंह मेहता के किरदार में

-दिनेश ठाकुर
खलील जिब्रान का कौल है, 'संगीत रूह की आवाज है। यह संघर्ष को खत्म कर शांति के दरवाजे खोलता है।' बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई के इतिहास में संगीत के कई किस्से दर्ज हैं। जब पूर्वी पाकिस्तान (जो बाद में बांग्लादेश बना) में बांग्ला भाषियों पर ढाए जा रहे जुल्मों को लेकर भारत और पाकिस्तान में ठनी हुई थी, न्यूयॉर्क के मेडिसन स्कवॉयर गार्डन में 1 अगस्त, 1971 को संगीत का ऐतिहासिक कंसर्ट हुआ। यूनिसेफ के इस आयोजन का मकसद युद्ध में बेघर हुए पूर्वी पाकिस्तान के लोगों की मदद करना था। कंसर्ट में मशहूर रॉक बैंड बीटल्स के गायकों के अलावा सितार वादक पंडित रविशंकर और सरोद वादक उस्ताद अकबर अली खान ने पूर्वी पाकिस्तान की आजादी के समर्थन में सुर बुलंद किए।

गीतों से खुफिया संदेश
युद्ध के दौरान हेमंत कुमार और आरती मुखर्जी के कुछ बांग्ला गीत भी रेडियो पर खूब बजे। मनोरंजन के बजाय इन गीतों को बजाने का मकसद खुफिया संदेश देना था। मसलन आकाशवाणी के कोलकाता केंद्र से सुबह 6 बजे आरती मुखर्जी का 'आमार पुतुल आजके प्रथम जाबे सुसुर बाड़ी' बजने का मतलब था कि हमला करने में 48 घंटे बचे हैं। इसी केंद्र से 14 अगस्त,1971 की सुबह 6 बजे हेमंत कुमार का 'आमी तोमाई जोतो शूनिए' सुनाया गया। यह भी खुफिया संदेश था कि रात को चार बंदरगाहों पर हमला करना है। संदीप उन्नीथन की किताब 'ऑपरेशन एक्स' में 1971 के युद्ध के ऐसे कई किस्सों का जिक्र है।

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'एयरलिफ्ट' के निर्देशक की फिल्म
इसी युद्ध पर ब्रिगेडियर (रिटायर्ड) बलराम सिंह मेहता की 'द बर्निंग चैफीज' एक और चर्चित किताब है। इस पर 'पिप्पा' नाम की फिल्म बनाई जा रही है। यह 12 दिन के 'गरीबपुर के युद्ध' के बारे में है, जो 1971 का युद्ध शुरू होने से पहले भारत और बांग्लादेश की मुक्ति वाहिनी सेना ने पाकिस्तान की सेना से लड़ा था। इस युद्ध में पीटी-76 टैंक भारतीय सेना की सबसे बड़ी ताकत साबित हुए। इन्हीं टैंकों को पिप्पा कहा जाता है। गरीबपुर का युद्ध पूरी तरह टैंक-युद्ध था, जिसमें भारत की तरफ से ब्रिगेडियर बलराम सिंह मेहता ने मोर्चा संभाला था। 'पिप्पा' में उनका किरदार ईशान खट्टर अदा कर रहे हैं। बाकी कलाकारों में मृणाल ठाकुर, सोनी राजदान और प्रियांशु पेनयुली शामिल हैं। 'एयरलिफ्ट' के बाद युद्ध की पृष्ठभूमि पर निर्देशक राजा कृष्णा मेनन की यह दूसरी फिल्म होगी। यहां युद्ध के बीच ए.आर. रहमान सुरों के फूल खिलाएंगे।

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'मेहरजान' का हुआ था भारी विरोध
बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई पर इससे पहले भी कई फिल्में बन चुकी हैं। आइ.एस. जौहर ने 'जय बांग्लादेश' 1971 में ही बना दी थी। इस बचकाना फिल्म को सेंसर बोर्ड से जूझना पड़ा। इसके साथ 'माया मिली न राम' वाला मामला रहा। सालभर बाद इसका परिवर्तित संस्करण 'आगे बढ़ो' नाम से आया। इस बार भी लोग फिल्म देखने सिनेमाघरों की तरफ नहीं बढ़े। दस साल पहले बांग्लादेश की फिल्मकार रुबैयत हुसैन ने जया बच्चन और विक्टर बनर्जी को लेकर 'मेहरजान' बनाई। यह युद्ध के दौरान महिलाओं पर हुए जुल्मों के बारे में है। कुछ प्रसंगों को लेकर बांग्लादेश में इस फिल्म का भारी विरोध हुआ। नतीजतन वहां के सिनेमाघरों में इसका प्रदर्शन रोकना पड़ा। फारूक शेख, राइमा सेन और पवन मल्होत्रा की 'चिल्ड्रन ऑफ वॉर' एक और उल्लेखनीय फिल्म है। यह बच्चों पर युद्ध के दुष्प्रभावों को टटोलती है।



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